यूपी भाजपा नया अध्यक्ष के रूप में कुर्मी पर खेलेगी दांव ! सात बार के सांसद व केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी का नाम सबसे आगे
लोकसभा झटके के बाद बड़ा फैसला! कुर्मी-पटेल कार्ड खेलेगी BJP?

यूपी भाजपा में बड़ा उलटफेर! सात बार के सांसद पंकज चौधरी बन सकते हैं प्रदेश अध्यक्ष, 2027 के लिए मास्टरस्ट्रोक की तैयारी
लखनऊ | बेबाक मंच ब्यूरो
लोकसभा चुनाव में अपेक्षित परिणाम न आने के बाद भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक सर्जरी की तैयारी में है। इसी बीच सात बार के सांसद और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं, जिससे प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है।
सूत्रों की मानें तो भाजपा नेतृत्व 2027 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पिछड़े वर्गों, खासकर कुर्मी/पटेल समाज को साधने के लिए बड़ा दांव खेलने जा रही है। पंकज चौधरी का नाम सामने आना सपा के पीडीए फॉर्मूले को चुनौती देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
शीर्ष नेतृत्व के सबसे भरोसेमंद चेहरों में पंकज चौधरी
पंकज चौधरी को भाजपा और आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व का करीबी माना जाता है। शांत स्वभाव, सादगी और संगठन के प्रति समर्पण उनकी पहचान है। आक्रामक राजनीति से दूर रहकर जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ मजबूत संवाद उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विश्वस्त नेताओं में उनका नाम लिया जाता है।
पीएम मोदी की घर-भेंट से बढ़ा सियासी कद
लोकसभा चुनाव से पहले गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी समारोह के दौरान पीएम मोदी का प्रोटोकॉल तोड़कर पंकज चौधरी के घर जाना सियासी गलियारों में बड़ा संकेत माना गया था। संकरी गलियों से पैदल पहुंचकर की गई यह मुलाकात, पंकज चौधरी के बढ़ते राजनीतिक कद का प्रतीक बताई जा रही है।
पार्षद से संसद तक: लंबा और संघर्षपूर्ण सफर
1989 में पार्षद से राजनीति की शुरुआत करने वाले पंकज चौधरी ने उपमहापौर से लेकर महाराजगंज से सात बार सांसद बनने तक का लंबा सफर तय किया है। उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक जीवन के बावजूद वे लगातार जनता और संगठन से जुड़े रहे।
संगठन में बड़े बदलाव के संकेत
हालांकि भाजपा की ओर से अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाएं तेज होना इस बात का संकेत है कि यूपी भाजपा में बड़ा बदलाव जल्द हो सकता है। यदि यह फैसला होता है, तो इसे 2027 की लड़ाई से पहले भाजपा का बड़ा सामाजिक और राजनीतिक दांव माना जाएगा।
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