UP में SIR का काला सच: बिना ट्रेनिंग, बिना तैयारी – कर्मचारी खतरे में, सरकार चुप क्यों ?
डॉ. पल्लवी पटेल का बड़ा बयान - SIR कर्मचारियों की जान पर खेल रहा है। UP में बिना ट्रेनिंग और गाइडलाइन के लागू योजना पर उठ रहे गंभीर सवाल...
उत्तर प्रदेश में SIR नहीं… “SIR-आतंक”! क्या यह सिस्टम रिफॉर्म है या सिस्टम रिमूवल?
बेबाक मंच | विशेष रिपोर्ट | लखनऊ उत्तर प्रदेश में हाल ही में लागू की गई सरकारी योजना SIR, कागज़ों में System Improvement Reform कहलाती है, लेकिन जमीन पर कर्मचारी इसे पढ़ रहे हैं – “Stress, Injury & Risk.”
योजना की शुरुआत जिस जल्दबाज़ी में हुई है, उसने इसे सुधार से ज़्यादा एक प्रयोगशाला का हादसा बना दिया है। जहाँ योजनाएँ प्लानिंग से नहीं, प्रचार से शुरू हों—वहाँ असर कागज़ पर नहीं, इंसान की साँसों पर पड़ता है।
बिना ट्रेनिंग, बिना तैयारी, बिना संसाधन – SIR का “डायरेक्ट लागू” मॉडल
सिस्टम सुधार की जिन योजनाओं को महीनों की ट्रेनिंग, तकनीकी तैयारी और चरणबद्ध लागू करने की ज़रूरत होती है, उन्हें सरकार ने एक आदेश में लागू कर दिया- “आज से लागू।”
लेकिन: न कोई स्पष्ट गाइडलाइन, न पर्याप्त स्टाफ, न सुरक्षा इंतज़ाम, न समय-सीमा की व्यावहारिकता
इसका नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में दहशत, दबाव और भारी तनाव का माहौल बन गया है। कर्मचारी काम नहीं कर रहे डर निभा रहे हैं। कई कर्मचारियों की तबीयत बिगड़ी है, कई ने अस्पताल का रुख किया, और कुछ मामलों में जीवन तक खतरे में पड़ गया।
दूसरी तरफ सरकारी बयान वही पुराने “योजना सफल है, कार्य प्रगति पर है।”
पल्लवी पटेल का बड़ा बयान—“यह सुधार नहीं, कर्मचारियों की जिंदगी पर प्रयोग है”
समाजवादी पार्टी की विधायक डॉ. पल्लवी पटेल ने SIR व्यवस्था पर खुलकर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा: “यह सिस्टम सुधार की योजना नहीं, बल्कि बिना तैयारी थोपा गया बोझ है।”
उनकी मांग साफ है- जब तक ट्रेनिंग, संसाधन, सुरक्षा और समय-सीमा तय न हो, SIR योजना को तत्काल वापस लिया जाए।
उनका विरोध राजनीति नहीं उन हजारों कर्मचारियों की आवाज़ है, जो खुलकर बोल नहीं पा रहे, लेकिन भीतर से टूट रहे हैं।
उनका संदेश साफ: “सिस्टम इंसान को कुचलकर नहीं, संभालकर बदला जाता है।”
UP का इतिहास: नोटबंदी की लाइनें, GST की उलझन, कोविड का अराजकता अब SIR का दबाव
उत्तर प्रदेश वह राज्य है जिसने- नोटबंदी की लंबी लाइनें, GST की थकाऊ जटिलताएँ, कोविड की अफरा-तफरी सब झेला है। अब एक और प्रयोग—SIR। और असर सीधे कर्मचारियों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ रहा है।
काम का बोझ नहीं, डर का बोझ – सरकारी रणनीति बदल रही है?
प्रदेश भर में कर्मचारी कह रहे हैं— “ड्यूटी हम निभाते हैं, पर सुरक्षित हम नहीं हैं।” तनाव बढ़ रहा, खतरे बढ़ रहे और प्रशासन की सख्ती चरम पर है
लोग पूछ रहे हैं- क्या सरकार के पास विशेषज्ञों की कमी है, या फैसले एक कमरे, एक कुर्सी, और एक अहंकार में लिए जा रहे हैं? क्या लोकतंत्र अब केवल पोस्टर और भाषण बनकर रह गया है?
जनता का व्यंग्य—“यहाँ Plan-B नहीं होता, यहाँ Plan-RIP होता है।”
प्रदेश में जिस तरह योजनाएँ बिना तैयारी के लागू की जा रही हैं, लोग तंज कस रहे हैं: “UP में प्लान नहीं बनता… यहाँ RIP बनता है।”
सुधार चाहिए तो पहले इंसान बचाओ
अगर सरकार को सच में “System Improvement” चाहिए, तो पहले सिस्टम चलाने वाले—कर्मचारी—सुरक्षित हों।
मशीनें दबाव से चलती हैं, इंसान सम्मान से।
अगर रवैया नहीं बदला… तो इतिहास योजनाओं की नहीं, सरकार की असफलता लिखेगा
अगर यही अंदाज़ जारी रहा, तो इतिहास यह नहीं लिखेगा कि SIR योजना असफल हुई- इतिहास लिखेगा: “जनता और कर्मचारियों के सामने सरकार असफल हुई।”
